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RTE Act | केंद्र से फंड न मिलने का हवाला देकर राज्य शिक्षकों को कम मानदेय नहीं दे सकता: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार द्वारा धनराशि जारी न किए जाने का हवाला देकर राज्य सरकार शिक्षकों को बेहद कम मानदेय देने का औचित्य नहीं ठहरा सकती। कोर्ट ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के क्रियान्वयन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, और उसे पहले शिक्षकों को भुगतान करना होगा; केंद्र का हिस्सा बाद में वसूला जा सकता है। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि सर्व शिक्षा अभियान/समग्र शिक्षा योजना के तहत नियुक्त अंशकालिक प्रशिक्षकों (फिजिकल एजुकेशन, आर्ट व वर्क एजुकेशन) को ₹17,000 प्रति माह मानदेय दिया जाए। कोर्ट ने RTE Act, 2009 की धारा 7(5) पर भरोसा करते हुए कहा कि अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए धन उपलब्ध कराने का अंतिम दायित्व राज्य पर है।
कोर्ट ने कहा: “शिक्षकों/प्रशिक्षकों को मानदेय का प्रारंभिक भुगतान राज्य सरकार करेगी। केंद्र सरकार का अंश यदि बाद में न मिले, तो राज्य ‘पे एंड रिकवर’ (पहले भुगतान, बाद में वसूली) के सिद्धांत पर केंद्र से उसकी भरपाई कर सकता है।” मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2013 में यूपी सरकार ने 10,000 प्रशिक्षकों की नियुक्ति ₹7,000 प्रति माह (11 माह का नवीकरणीय अनुबंध) पर की थी। 2017-18 में प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (PAB) ने मानदेय बढ़ाकर ₹17,000 करने की मंजूरी दी, फिर भी भुगतान नहीं बढ़ा।
2019-20 में मानदेय फिर से ₹7,000 कर दिया गया। राज्य सरकार ने दलील दी कि समग्र शिक्षा योजना केंद्र-प्रायोजित है (60:40—केंद्र:राज्य), और केंद्र का 60% हिस्सा न मिलने पर राज्य पूरा भुगतान नहीं कर सकता। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी खंडपीठ ने राज्य की दलील खारिज करते हुए कहा कि: “धारा 7 वित्तीय साझेदारी की बात करती है, लेकिन धारा 7(5) स्पष्ट रूप से राज्य को अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए धन उपलब्ध कराने का दायित्व सौंपती है। केंद्र से विवाद का खामियाजा शिक्षकों को नहीं भुगतना चाहिए।” अतः कोर्ट ने दोहराया कि राज्य को पहले भुगतान करना होगा, और यदि केंद्र अपना हिस्सा नहीं देता, तो बाद में वसूली की जा सकती है।

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