ग़ज़ल
यारों मैंने कितनी हसीन ज़िन्दगी पाई हैं,
जब खुशी आई ग़म ने शिकस्त खाई है।
यूं तो सितम सहने की आदत पड़ गई है,
बावजूद इसके मेरी जिंदगी संवर गई हैं।
वह कर्म समझ के जुल्म किए जा रहे हैं,
हम भी तो संतुष्ट होकर जिए जा रहे हैं।
नाकामियों ने तो जिंदगी में डेरा डाला है,
उम्मीद की किरणों ने ही सवेरा पाला है।
और जिंदगी में कितना गड़बड़ झाला है,
तारीफ़ हैं ‘माँ-पिता’ ने नाज़ों से पाला है।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)
मो. 98260 25986
(स्व-रचित, मौलिक व अप्रकाशित






