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माता-पिता की निजता का अधिकार, संतान के पितृत्व जानने के अधिकार पर भारी: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने महत्त्वपूर्ण निर्णय में कहा कि कुछ परिस्थितियों में माता-पिता का निजता और गरिमा का अधिकार संतान के पितृत्व जानने के अधिकार पर हावी हो सकता है। अदालत ने DNA टेस्ट कराने के निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा लेकिन पुलिस की ज़बरदस्ती या बल प्रयोग की अनुमति देने वाले हिस्से को हटा दिया। जस्टिस अर्चना पुरी ने कहा कि बच्चे को अपने पितृत्व की सच्चाई जानने का अधिकार है। विशेषकर तब जब पिता होने से इंकार किया गया हो। उन्होंने कहा कि न्याय के हित में यह आवश्यक है कि सत्य सामने आए, क्योंकि सत्य को स्थापित किया ही जा सकता है।
साथ ही अदालत ने माना कि पिता कहे जा रहे व्यक्ति का निजता का अधिकार भी महत्त्वपूर्ण है लेकिन यह संतान के पितृत्व संबंधी अधिकार से पूरी तरह ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि जब कोई संतान बालिग होकर स्वयं यह दावा करती है तो उसे इसके सामाजिक परिणामों का भी ज्ञान होता है। मामले में निचली अदालत ने DNA टेस्ट कराने और आवश्यकता पड़ने पर पुलिस सहायता देने का आदेश दिया था। इसे चुनौती देते हुए पिता ने तर्क दिया कि संतान का जन्म विवाह के दौरान हुआ, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 लागू होती है, जो संतान को वैध मानती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब पितृत्व से ही इनकार किया जा रहा है तो धारा 112 का अनुमान लागू नहीं होगा। न्यायालय ने कहा कि DNA टेस्ट पितृत्व निर्धारित करने का सबसे विश्वसनीय तरीका है। यदि व्यक्ति वास्तव में पिता है तो उसकी स्थिति और मज़बूत होगी और यदि नहीं है तो सत्य उजागर होगा। अदालत ने अंत में कहा कि परीक्षण किया जाना चाहिए लेकिन इसके लिए पुलिस बल का सहारा लेना उचित नहीं होगा।

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