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चुनाव से पहले बिहार के मतदाता सूची संशोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे योगेंद्र यादव

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संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की गई, जिसमें बिहार में मतदाता सूची के भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के “विशेष गहन संशोधन” (SIR) को चुनौती दी गई। याचिका में आशंका जताई गई कि इससे राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों से पहले बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित होने की स्थिति पैदा हो सकती है। चुनाव विश्लेषक और राजनेता योगेंद्र सिंह यादव द्वारा दायर की गई जनहित याचिका में SIR पर तत्काल रोक लगाने की भी मांग की गई, जिसमें इसे “स्पष्ट रूप से मनमाना, अनुचित और चुनावी कानूनों का उल्लंघन करने वाला” बताया गया। अंतरिम राहत के हिस्से के रूप में याचिकाकर्ता ने कोर्ट से चल रही SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने, जनवरी 2025 में अंतिम बार अपडेट की गई मौजूदा मतदाता सूची से किसी भी नाम को हटाने से रोकने और ECI को उन मौजूदा सूचियों का उपयोग करके बिहार के चुनाव कराने का निर्देश देने का आग्रह किया।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि संशोधन प्रक्रिया मौजूदा मतदाताओं को 11 दस्तावेजों के एक संकीर्ण सेट का उपयोग करके अपनी पात्रता को फिर से स्थापित करने के लिए मजबूर करती है, जिसमें आधार कार्ड, राशन कार्ड और मनरेगा जॉब कार्ड जैसे व्यापक रूप से प्रचलित प्रमाणों को जानबूझकर शामिल नहीं किया जाता। 25 जुलाई, 2025 तक आवश्यक फॉर्म जमा न करने पर प्रभावित मतदाताओं को सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना ही नामों को स्वचालित रूप से हटा दिया जाएगा, जो कि याचिका में कहा गया कि प्राकृतिक न्याय सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।
याचिका में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि संशोधन अभ्यास महिलाओं, SC/ST समुदायों और प्रवासियों जैसे हाशिए के समूहों को असंगत रूप से प्रभावित करता है, जिनमें से कई के पास निर्दिष्ट दस्तावेज़ नहीं हैं। बिहार के मानसून के मौसम के साथ ओवरलैप होने वाली 90-दिवसीय सत्यापन अवधि की भी अव्यावहारिक रूप से आलोचना की जाती है, क्योंकि मीडिया रिपोर्टों (द हिंदू, द इंडियन एक्सप्रेस) के अनुसार इन वर्गों के लोगों की एक बड़ी संख्या के पास जन्म प्रमाण पत्र, भूमि दस्तावेज या अन्य अनिवार्य पहचान प्रमाण नहीं हैं, जिसके कारण बिहार के 7.89 करोड़ मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।
इसके अलावा, जनहित याचिका में तर्क दिया गया कि SIR जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 21-ए का उल्लंघन करता है, क्योंकि दोनों ही क़ानूनों में नामों को हटाने से पहले प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है। इसमें अनुच्छेद 14, 15 और 326 का हवाला देते हुए कहा गया कि यह प्रक्रिया भेदभावपूर्ण है और लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करती है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के केएस पुट्टस्वामी (2017) आनुपातिकता मानक और लाल बाबू हुसैन में 1995 के फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें मौजूदा मतदाताओं के लिए निरंतरता को बरकरार रखा गया।

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