हाईकोर्ट ने कहा कि प्रबंधन ने तर्क दिया कि कर्मचारी ने व्यक्तिगत कारणों से 30.07.2009 को इस्तीफा दिया था, जिसे कथित तौर पर उसी दिन स्वीकार कर लिया गया था। हालांकि, इस्तीफे का बारीकी से निरीक्षण करने पर यह प्रतीत होता है कि उसे हिंदी में किसी कुशल व्यक्ति ने लिखा है, जबकि महिला ने अपने अंगूठे का निशान लगाया, जो दर्शाता है कि वह संभावित रूप से अनपढ़ थी। इसके अलावा, प्रबंधन की ओर से पेश गवाह इस्तीफे पत्र पर लिखावट को सत्यापित नहीं कर सका और स्वीकार किया कि स्वीकृति दस्तावेज में अतिरिक्त हस्ताक्षरों की कमी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रबंधन का आचरण विश्वसनीय नहीं है क्योंकि इस्तीफे और स्वीकृति की प्रामाणिकता का समर्थन में कोई गवाह पेश नहीं किया गया है। महिला कर्मचारी की अनुमानित निरक्षरता को देखते हुए, हाईकोर्ट ने माना कि यह असंभव है कि वह प्रश्नगत दस्तावेजों की सामग्री को समझ सके। वहीं पूरी कार्यवाही के दरमियान, वह लगातार इस्तीफ देने से इनकार करती रही। नतीजतन, हाईकोर्ट ने श्रम न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और महिला कर्मचारी की बर्खास्तगी को आईडी एक्ट की धारा 25-एफ का उल्लंघन माना और इस प्रकार अवैध घोषित किया।
लांकि, परिस्थितियों को समझते हुए प्रबंधन को एक विकल्प प्रदान किया गया कि या तो महिला कर्मचारी को बहाल किया जाए या उसे तीन महीने के भीतर तीन लाख रुपये एक मुश्त मुआवाजा दिया जाए।