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साज़िश के कमज़ोर सबूत, मजबूर गवाह: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार मर्डर केस में गुरमीत राम रहीम को क्यों बरी किया?

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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्रकार राम चंदर छत्रपति के मर्डर केस में गुरमीत राम रहीम सिंह को यह मानते हुए बरी किया कि सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने एक गवाह को गुरमीत राम रहीम सिंह को फंसाने वाला बयान देने के लिए मजबूर किया था। कोर्ट ने बाकी तीन आरोपियों – कुलदीप, निर्मल और कृष्ण लाल की सज़ा और उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी। CBI कोर्ट ने पहले इन सभी को इस केस में दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।
जस्टिस विक्रम अग्रवाल और चीफ़ जस्टिस शील नागू की डिवीज़न बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हालात से पता चलता है कि अकेले गवाह, खट्टा सिंह पर सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) ने गुरमीत राम रहीम सिंह को फंसाने वाला बयान देने के लिए दबाव डाला था। बेंच ने कहा, “ऐसा लगता है कि उसे (खट्टा सिंह, साज़िश का अकेला गवाह) CBI ने बयान देने के लिए मजबूर किया, क्योंकि CBI पर [हाई कोर्ट से] जांच पूरी करने का दबाव था। खट्टा सिंह ने अपनी कई एप्लीकेशन में ऐसा कहा था। यह बहुत चिंता की बात है कि एक बड़ी जांच एजेंसी ने मामले में कामयाब होने के लिए इस तरह का तरीका अपनाया। कोशिश यह होनी चाहिए थी कि मामले की तह तक जाकर सच सामने लाया जाए।”
कोर्ट ने पंचकूला की स्पेशल CBI कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा और उम्रकैद की सज़ा रद्द की, जिसने पहले राम रहीम को सिरसा के पत्रकार की हत्या में क्रिमिनल साज़िश का दोषी ठहराया था। मामले की पृष्ठभूमि शाम के डेली अखबार ‘पूरा सच’ के एडिटर छत्रपति को 24 अक्टूबर, 2002 को सिरसा में उनके घर के बाहर गोली मार दी गई। बाद में 21 नवंबर, 2002 को दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में गोली लगने से उनकी मौत हो गई। यह हमला कथित तौर पर तब किया गया जब उन्होंने राम रहीम पर डेरा में महिला अनुयायियों के यौन शोषण का आरोप लगाने वाली रिपोर्टें छापीं।
सिरसा के सिटी पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 307 और 34 और आर्म्स एक्ट के प्रोविज़न के तहत FIR दर्ज की गई। छत्रपति की मौत के बाद जुर्म को IPC की धारा 302 के तहत मर्डर और IPC की धारा 120-B के तहत कॉन्सपिरेसी में बदल दिया गया। हरियाणा पुलिस की गलत जांच का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर होने के बाद 2003 में जांच सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन को ट्रांसफर कर दी गई। 2019 में स्पेशल CBI कोर्ट ने राम रहीम के साथ कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल (डेरा मैनेजर) को कॉन्सपिरेसी और मर्डर का दोषी ठहराया और उन्हें उम्रकैद की सज़ा सुनाई।
हाईकोर्ट ने होमिसाइड को सही ठहराया लेकिन कॉन्सपिरेसी की फिर से जांच की अपील पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने सबसे पहले यह कन्फर्म किया कि छत्रपति की मौत होमिसाइडल थी। कोर्ट ने मेडिकल सबूतों पर भरोसा किया, जिसमें जर्नलिस्ट की जांच करने वाले और पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों की गवाही भी शामिल थी, जिससे यह साबित हुआ कि उनकी मौत गनशॉट इंजरी से हुई कॉम्प्लीकेशंस की वजह से हुई। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि राम रहीम का कथित तौर पर शामिल होना क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी के आरोप तक ही सीमित था। इसलिए पत्रकार को खत्म करने के लिए “मिली-जुली सोच” का साफ़ सबूत चाहिए था। क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी पर सुप्रीम कोर्ट के कानून का ज़िक्र करते हुए, जिसमें केहर सिंह बनाम राज्य (दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन) और योगेश बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे मामलों में बताए गए सिद्धांत शामिल हैं, हाईकोर्ट ने दोहराया कि कॉन्सपिरेसी को हालात के सबूतों से साबित किया जा सकता है, लेकिन हालात की चेन पूरी होनी चाहिए और सिर्फ़ आरोपी के गुनाह की ओर इशारा करना चाहिए। डेरा के अनुयायियों की भूमिका कोर्ट ने कहा, “ऐसे (राम रहीम) पब्लिक फिगर हमेशा खबरों में रहते हैं। कभी अच्छे कारणों से तो कभी बुरे कारणों से। यह सब जानते हैं कि A1 (राम रहीम) के बहुत सारे फॉलोअर्स हैं। हमारे देश में धर्म, जाति, पंथ बहुत ज़रूरी भूमिका निभाते हैं। धर्म, जाति, पंथ वगैरह के नाम पर जानें ली और दी जाती हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों पर झगड़े हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। कई धर्मों, पंथों वगैरह के अनुयायियों को ‘कट्टर’ कहा जा सकता है।” सजा सिर्फ भरोसेमंद गवाह पर आधारित कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का राम रहीम को दोषी ठहराना लगभग पूरी तरह से एक ही गवाह – खट्टा सिंह की गवाही पर आधारित था, जो पहले डेरा चीफ का ड्राइवर था। हाईकोर्ट के मुताबिक, जांच और ट्रायल के दौरान गवाह ने कई बार अपना बयान बदला। शुरू में उन्होंने छत्रपति मर्डर के सिलसिले में राम रहीम का नाम नहीं लिया था। कई साल बाद उन्होंने आरोप लगाया कि राम रहीम ने पूरा सच में छपे एक आर्टिकल से नाराज़ होकर हत्या का ऑर्डर दिया था। बेंच ने कहा कि घटना के बाद गवाह कई सालों तक चुप रहा, पहले उसने दावा किया कि CBI उस पर राम रहीम को फंसाने के लिए दबाव डाल रही है। बाद में ट्रायल के दौरान मुकर गया और बाद में वापस बुलाए जाने पर उसने अपना बयान फिर से बदल दिया। इन विरोधाभासों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि ऐसे गवाह की गवाही पर बिना मज़बूत सबूत के भरोसा नहीं किया जा सकता। वडिवेलु थेवर बनाम मद्रास राज्य में बताए गए सिद्धांतों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जिस गवाह की गवाही न तो पूरी तरह भरोसेमंद हो और न ही पूरी तरह भरोसेमंद न हो, उसे ज़रूरी बातों में सबूत की ज़रूरत होती है। इस मामले में, कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला। राम रहीम का नाम लेने में देरी हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि न तो FIR और न ही गिरफ्तार हमलावरों के बयानों में शुरू में राम रहीम का नाम था। उसका नाम घटना के लगभग पांच साल बाद तब सामने आया जब खट्टा सिंह ने अपना बयान दिया। कोर्ट ने कहा कि इस बड़ी देरी ने साजिश के बारे में सरकारी वकील के केस को और कमज़ोर कर दिया। मुख्य गवाह से पूछताछ न करना एक और ज़रूरी बात यह थी कि प्रॉसिक्यूशन ने उस पुलिस ऑफिसर से पूछताछ न करने का फ़ैसला किया, जिसने कथित तौर पर छत्रपति का बयान तब रिकॉर्ड किया, जब वह अस्पताल में भर्ती थे। कोर्ट ने इस गवाह को बहुत ज़रूरी बताया, खासकर इसलिए क्योंकि प्रॉसिक्यूशन का केस राम रहीम की साज़िश साबित करने पर टिका था। ऑफिसर से पूछताछ न करने से प्रॉसिक्यूशन के वर्जन पर गंभीर शक पैदा हुआ। शक का फ़ायदा क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के बुनियादी सिद्धांतों पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने माना कि प्रॉसिक्यूशन को बिना किसी शक के गुनाह साबित करना होगा। शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य में बताए गए हालात के सबूतों को कंट्रोल करने वाले सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब सबूतों के दो संभावित मतलब मौजूद हों – एक गुनाह की ओर इशारा करता है और दूसरा बेगुनाह की ओर – तो आरोपी को शक का फ़ायदा मिलना चाहिए। बेंच ने यह नतीजा निकाला कि रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से राम रहीम का साज़िश में शामिल होना ज़रूरी हद तक पक्का साबित नहीं होता। सह-आरोपी के खुद से कार्रवाई करने की संभावना कोर्ट ने यह भी देखा कि यह हो सकता है कि असली शूटर और दूसरे आरोपियों ने अपनी पहल पर काम किया हो। राम रहीम के बहुत सारे फॉलोअर्स को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ फॉलोअर्स ने खुद से काम किया हो। कोर्ट ने मीडिया कवरेज पर भी कहा, “अक्सर कहा जाता है कि कोर्ट और जजों को मीडिया रिपोर्ट और किसी मामले को मिलने वाले पब्लिक अटेंशन से प्रभावित नहीं होना चाहिए। मामलों का फैसला सख्ती से कानून के मुताबिक होना चाहिए। यह ध्यान में रखना होगा कि क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के सिद्धांतों के अनुसार किसी आरोपी का गुनाह बिना किसी शक के साबित करना ज़रूरी है। यह अच्छी तरह से तय है कि जैसे ही कोई शक पैदा होता है, उसका फायदा आरोपी को मिलना चाहिए।” इसके बाद कोर्ट ने छत्रपति मर्डर केस में क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी के आरोप से राम रहीम को बरी किया और उसकी सज़ा और उम्रकैद की सज़ा को रद्द कर दिया। हालांकि, बेंच ने दूसरे आरोपियों की सज़ा बढ़ा दी।

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