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उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने हाईकोर्ट को न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों व कार्रवाई की जानकारी RTI के तहत देने का निर्देश दिया

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उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने एक अहम आदेश में उत्तराखंड हाईकोर्ट के लोक सूचना अधिकारी (PIO) को निर्देश दिया है कि वे राज्य की अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए कदाचार संबंधी आरोपों और उन पर की गई या अनुशंसित कार्रवाई से जुड़ी जानकारी भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को उपलब्ध कराएं। यह आदेश मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी ने 1 जनवरी को पारित किया। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि लोक सूचना अधिकारी सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक अनुमोदन प्राप्त कर यह सुनिश्चित करें कि मांगी गई जानकारी आदेश की प्राप्ति के एक माह के भीतर अपीलकर्ता को उपलब्ध कराई जाए और इसकी अनुपालना की सूचना आयोग को दी जाए।
मामले की पृष्ठभूमि संजीव चतुर्वेदी ने 14 मई, 2025 को उत्तराखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय के लोक सूचना अधिकारी को एक आरटीआई आवेदन भेजा था। इस आवेदन के माध्यम से उन्होंने अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों के सेवा नियमों, आचरण एवं अनुशासनात्मक कार्यवाही से संबंधित नियमों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जानकारी चाही थी कि न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार या अन्य कदाचार की शिकायतें कहां और किस सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज की जा सकती हैं। इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया और प्रपत्र क्या हैं।
सबसे महत्वपूर्ण रूप से, चतुर्वेदी ने 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 तक अधीनस्थ न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ दर्ज कुल शिकायतों की संख्या और उन मामलों की जानकारी मांगी थी, जिनमें अनुशासनात्मक या आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की गई या कार्रवाई की गई। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपनी आरटीआई आवेदन के निपटारे से संबंधित फाइल नोटिंग और दस्तावेजों की प्रतियां भी मांगी थीं। लोक सूचना अधिकारी ने 19 जून, 2025 को पत्र के माध्यम से कुछ जानकारी अपीलकर्ता को भेजी, लेकिन चतुर्वेदी का कहना था कि उन्हें मांगी गई पूरी और ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
इसके बाद उन्होंने 23 जून, 2025 को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के समक्ष प्रथम अपील दायर की, जिसका निस्तारण कर दिया गया। हालांकि, संतोषजनक सूचना न मिलने के कारण चतुर्वेदी ने राज्य सूचना आयोग के समक्ष द्वितीय अपील दायर की। आयोग के समक्ष उन्होंने दलील दी कि सूचना का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 से उत्पन्न होता है और उन्हें विशेष रूप से बिंदु संख्या 3 के अंतर्गत मांगी गई जानकारी, यानी न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों की संख्या और उन पर की गई अनुशासनात्मक या आपराधिक कार्रवाई की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
दूसरी ओर, लोक सूचना अधिकारी ने आयोग को बताया कि यह जानकारी गोपनीय प्रकृति की है और तीसरे पक्ष से संबंधित है। इसलिए इसे सीधे उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी जानकारी प्रदान करने से पहले उत्तराखंड हाईकोर्ट चीफ जस्टिस की अनुमति आवश्यक है। इन तर्कों पर विचार करने के बाद राज्य सूचना आयोग ने द्वितीय अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह निर्देश दिया कि सक्षम स्तर से अनुमोदन प्राप्त कर मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई जाए। इसी के साथ आयोग ने मामले का निस्तारण कर दिया।

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