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‘अब तक उन्हीं फांसी क्यों नहीं दी?’: बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सज़ा कम करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र से सवाल

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सुप्रीम कोर्ट ने बब्बर खालसा के आतंकवादी बलवंत सिंह राजोआना की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह हत्याकांड में उसे दी गई मौत की सज़ा कम करने की मांग की गई थी। वह 2012 से राष्ट्रपति के समक्ष लंबित अपनी दया याचिका पर विचार में हो रही देरी के आधार पर सजा में छूट की मांग कर रहे हैं। पंजाब के एक पुलिस अधिकारी, सिंह को 27 जुलाई, 2007 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की एक विशेष अदालत ने भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 120-बी, 302, 307 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 की धारा 3(बी), 4(बी) और 5(बी) के साथ धारा 6 के तहत दोषी ठहराया था। यह घटना 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ सचिवालय परिसर में हुए घातक आत्मघाती बम विस्फोट की थी, जिसमें पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह सहित 16 अन्य लोगों की जान चली गई।
सिंह की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ के समक्ष दलील दी कि राजोआना 29 साल से अधिक समय से जेल में बंद है। रोहतगी ने आगे कहा, “यह व्यक्ति 15 साल से मौत की सज़ा काट रहा है। इसलिए जब मैं पिछली याचिका में आपके पास आया तो आपने कहा कि नहीं, उसने दया याचिका दायर नहीं की। गुरुद्वारा समिति ने याचिका दायर की…पूरे सम्मान के साथ, यह प्रावधानों के विपरीत है। प्रावधानों के अनुसार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन याचिका दायर करता है; इस पर विचार किया जाना चाहिए। यह अनुच्छेद 21 और 433 [CrPC] का मामला है। आपने अंततः कहा कि इतना समय बीत चुका है, उन्हें कभी न कभी इस पर फैसला करना चाहिए। यह ढाई साल पहले कहा गया।”
रोहतगी ने टिप्पणी की कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने 2024 में एक और याचिका दायर की। इस याचिका पर जनवरी में पारित अंतिम आदेश में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बी.आर. गवई, जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की स्पेशल बेंच ने केंद्र को उसकी दया याचिका पर फैसला करने का आखिरी मौका दिया था। अदालत ने कहा था कि यदि केंद्र ऐसा करने में विफल रहता है तो याचिका पर अंतिम फैसला अदालत द्वारा किया जाएगा।
Case Details: Balwant Singh v. UOI & Ors, W.P.(Crl.) No. 414/2024

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